Nirjala Ekadashi: निर्जला एकादशी पर जानिए व्रत का महात्म्य, लाभ, विधि और कथा

By charpesuraj5@gmail.com

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Nirjala Ekadashi: निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और सबसे कठिन माना जाता है. इस व्रत की महिमा का विस्तृत वर्णन पद्म पुराण में किया गया है कि इस व्रत को करने से सभी एकादशियों का फल मिल जाता है. पाण्डवों में भीम ने इसी व्रत के प्रभाव से स्वर्ग प्राप्त किया था. जो लोग व्रत करते हैं उन्हें निर्जला एकादशी की कथा सुनने से पूर्ण फल मिलता है. आप भी पद्म पुराण में दी गई ये पूरी कथा विस्तार से पढ़िए.

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कथा:

तब वेदव्यास जी बोले – दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को भोजन ग्रहण न करें. द्वादशी तिथि पर स्नानादि करके शुद्ध होकर भगवान केशव की पूजा पुष्प आदि से करें और नित्य कर्म से निवृत्त होकर सबसे पहले ब्राह्मणों को भोजन कराएं और फिर स्वयं भोजन करें. राजन्! जन्म के अशुच और मरण के अशुच में भी एकादशी तिथि को भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए.

यह सुनकर भीमसेन बोले – अति बुद्धिमान् दादा जी! मेरी उत्तम बात सुनिए. राजा युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव – ये सब लोग कभी एकादशी पर भोजन नहीं करते और मुझसे सदा कहते हैं कि ‘भीमसेन! तू भी एकादशी पर भोजन मत कर.’ परंतु मैं उनसे सदा यही कहता हूँ कि ‘मैं भूख नहीं सह सकता.’

भीमसेन की बात सुनकर व्यास जी बोले- यदि स्वर्ग को प्राप्त करना चाहते हो और नरक को अशुभ मानते हो तो दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को भोजन ग्रहण मत करो.

भीमसेन बोले- हे महामुनि जी! मैं सत्य कहता हूँ, एक बार भोजन करने के बाद भी मैं उपवास नहीं कर सकता. फिर मैं व्रत कैसे कर सकता हूँ? मेरे पेट में सदा ही वृक नामक अग्नि जलती रहती है अतः वह बहुत खाना खाने से ही शांत होती है. इसलिए हे महामुनि! मैं वर्ष में केवल एक बार ही व्रत कर सकता हूँ, जिससे स्वर्ग प्राप्ति सुलभ हो और करने से जो पुण्य का भागी बन सकूं, वैसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइए. मैं उसका विधिपूर्वक पालन करूंगा.

व्यास जी बोले- भीम! ज्येष्ठ मास में जब सूर्य वृष या मिथुन राशि में हो, उस समय शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत अति उत्तम ध्यानपूर्वक करो. केवल कुल्ला करने या पानी पीने के लिए ही मुख में जल डाला जा सकता है, इसके अतिरिक्त कोई भी ज्ञानी व्यक्ति अन्य प्रकार का जल मुख में न डाले, नहीं तो व्रत भंग हो जाता है. यदि कोई व्यक्ति एकादशी के सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक जल पीने से भी परहेज करता है तो यह व्रत पूर्ण हो जाता है. उसके पश्चात द्वादशी तिथि को सबेरे साफ स्नान करके विधि अनुसार ब्राह्मणों को जल और सोना दान करें. इस प्रकार सारे कार्य संपन्न करके इन्द्रिय-दमन करने वाला व्यक्ति ब्राह्मणों के साथ भोजन ग्रहण करे. निर्जला एकादशी का व्रत करने से पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का फल मिल जाता है. इसमें कोई संदेह नहीं है. शंख, चक्र और गदाधारी भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि कोई मनुष्य सबको त्याग कर केवल मेरी ही शरण में आकर एकादशी का व्रत करता है तो वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है.’

निर्जला एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य के पास वे भयानक यमदूत नहीं आते जो विशाल, राक्षस जैसे दिखने वाले और काले रंग के होते हैं तथा दंड और पाश लिए रहते हैं.

निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे कठिन माना जाता है, लेकिन फलदायी भी। पद्म पुराण में इस व्रत के महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है। ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत को करने से पूरे साल की सभी एकादशियों का फल मिल जाता है। कथा के अनुसार, पाण्डवों में भीम ने इसी व्रत के प्रभाव से स्वर्ग प्राप्त किया था। निर्जला एकादशी की कथा सुनने से भी व्रत करने वालों को पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।

कथा से जुड़ा उपदेश:

कथा में बताया गया है कि जो लोग निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें मृत्यु के समय भगवान विष्णु के दूत ले जाते हैं। ये दूत पीले वस्त्र पहने हुए, सौम्य स्वभाव के और मन की गति से भी तेज होते हैं। दूसरी ओर, जो लोग एकादशी का व्रत नहीं करते, उनके पास भयानक यमदूत आते हैं।

निर्जला एकादशी व्रत विधि:

निर्जला एकादशी के व्रत में पानी पीना भी वर्जित होता है। सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक व्रत रखा जाता है। द्वादशी तिथि को स्नान करके दान का विधान है। ब्राह्मणों को जल और सोना दान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।

निर्जला एकादशी के लाभ:

निर्जला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। ग्रंथों के अनुसार, इस दिन दान करने का भी विशेष महत्व है। गाय का दान, स्वर्ण दान या घी से भरे पात्र का दान करना शुभ माना जाता है। ब्राह्मणों को दक्षिणा और मिठाई देकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

कथा के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत करने और रात में जागरण करने वाले व्यक्ति के साथ उसके पूर्वजों की सौ पीढ़ियां और आने वाली सौ पीढ़ियां भी भगवान वासुदेव के धाम को प्राप्त होती हैं।

निर्जला एकादशी पर वस्त्र, गाय, जल, बिस्तर, सुंदर आसन, कमंडल और छत्र आदि का दान करना सौभाग्यशाली माना जाता है। जूते का दान करने वाले को स्वर्ग में सुख मिलता है।

इस व्रत कथा को श्रद्धापूर्वक सुनने और सुनाने वाले दोनों को ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है