Kabirdas Jyanti: जीवन सफल बनाने के प्रेरक है कबीरदास के यह दोहे, जानिए संत कबीरदास जयंती विशेष

By charpesuraj5@gmail.com

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Kabirdas Jyanti: आज संत कबीरदास जी की जयंती है, इस अवसर पर हम उनकी उन प्रेरक दोहों के बारे में बात करेंगे जिन्हें सफलता का सूत्र माना जाता है. अगर आप भी उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो आपको कभी हार का सामना नहीं करना पड़ेगा.

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कबीर दास जी – महान कवि और विचारक

कबीरदास जी को एक महान कवि और विचारक माना जाता है. उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से लोगों का मार्गदर्शन किया और उन्हें सच्चा रास्ता दिखाया. जेष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन कबीर जयंती मनाई जाती है. माना जाता है कि संत कबीरदास का जन्म वर्ष 1398 में हुआ था. उस समय देश में हर जगह धार्मिक कर्मकांड और पाखंड का बोलबाला था. उन्होंने इस पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई और लोगों में भक्ति के बीज बोए. उनके दोहों ने समाज को सही रास्ता दिखाया. आज भी उनके दोहे लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं और हमें प्रगति का मार्ग दिखाते हैं. आइए जानते हैं उन खास दोहों में से कुछ जो आपके लिए भी उपयोगी हो सकते हैं.

छोटे को ना समझें कमजोर

तिनका कबहुं ना निन्दिये, जो पांवन तर होय,
कबहुं उड़ी आंखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि कभी भी किसी को छोटा समझकर उसका अपमान न करें. यह आपके लिए बहुत हानिकारक हो सकता है. अगर कोई छोटा सा तिनका भी आंख में चला जाए तो बड़े का भी बुरा हाल कर देता है. यानी आपको कभी भी अपने से छोटे या साथ काम करने वाले व्यक्ति को कमतर नहीं समझना चाहिए. आप अच्छा व्यवहार करेंगे तो सही समय पर वो आपके काम आएंगे. आप अपने लक्ष्य को पाने में भी उनका सहयोग प्राप्त कर सकेंगे.

लगातार प्रयास से मिलती है सफलता

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ: इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी यह समझाना चाहते हैं कि हमें हमेशा धैर्य रखना चाहिए. अपना काम करने के बाद फल मिलने का इंतजार धैर्यपूर्वक करना चाहिए. अगर माली पेड़ को एक बार में सौ घड़े पानी से सींच भी दे, तो भी फल पेड़ पर तभी आएगा जब उसका मौसम आएगा. आज के समय में इसे इस तरह से समझें कि अगर आप कोई बड़ा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं तो सबसे पहले अधीरता छोड़ दें और ईमानदारी से अपना काम करें और नतीजा समय पर छोड़ दें. ऐसा नहीं है कि कंपनी ने आपको टारगेट दिया है तो आप उसे एक ही दिन में पूरा करके बाकी दिन आराम से बैठ जाएं, ऐसा बिलकुल न करें. आपको निरंतर प्रयास करते रहना है और अपने काम में सुधार लाना है.

दुखी होने से बेहतर है आगे बढ़ना

कबीर हमारा कोई नहीं, हम काहू के नाहिं,
पारै पहुंचे नाव ज्यौ, मीलके बिछुरी जाह।

अर्थ: कबीरदास जी ने इस दोहे में दुनिया को नाव से तुलना की है. हम सब दुनिया की इस नाव में सवार हैं और हमारा किसी से कोई सरोकार नहीं है और ना ही हम किसी के हैं. जैसे ही नाव किनारे लगती है, हम सब अलग हो जाते हैं. आज के दौर में इसे इस तरह से समझें कि इस दुनिया में कोई भी हमेशा के लिए साथ नहीं रह सकता है. कभी ना कभी सभी को अलग होना है. इसलिए अगर आपसे कोई चीज चली जाए तो उसके लिए गम खाकर बैठने के बजाय आपको आगे बढ़ना चाहिए और अपना काम करना चाहिए.

दूसरों की कमियां ना ढूंढें उनकी मदद करें

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थ: कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि दूसरों की गलतियों को देखकर उनका उपहास उड़ाने से अच्छा है कि उनकी मदद करें। कार्यालय के वातावरण को देखें तो यह और भी स्पष्ट हो जाता है।

अपने सहकर्मियों की कमियों पर हंसने की बजाय उन्हें बताएं। किसी भी विषय का पूरा ज्ञान किसी को नहीं होता। इसलिए अगर आपके सहकर्मी को कुछ समझ नहीं आ रहा है तो उनका उपहास उड़ाने की बजाय उन्हें बताएं।

इसका फायदा आपको भविष्य में जरूर मिलेगा। क्योंकि हर ज्ञान कभी न कभी काम आता ही है। इसलिए दूसरों की कमियों को गिनना छोड़ दें और खुद पर ध्यान दें ताकि आप उस काम को बेहतर तरीके से कर सकें।

दोहा

ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय,
औरन को सीतल करे आपहुं सीतल होय।

अर्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि हमें ऐसे शब्द बोलने चाहिए जिन्हें सुनकर सामने वाला खुश हो जाए और आपको भी अच्छा लगे। आज के समय में देखा जाए तो मीठी वाणी किसी दवा से कम नहीं है।

तलवार से लगा हुआ घाव तो कुछ समय में भर जाता है लेकिन कठोर शब्द बोलने से लगा हुआ घाव कभी नहीं भरता। अगर आप सब से अच्छे से बात करेंगे तो लोग आपके मित्र बन जाएंगे और मुश्किल समय में आपका साथ देंगे। क्योंकि मीठी वाणी से बिगड़े हुए काम भी बन जाते हैं।