जैविक नींबू की खेती कर महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर, देखे डॉ. रतन लाल शर्मा की प्रेरक कहानी…

By Alok Gaykwad

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जैविक नींबू की खेती कर महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर, देखे डॉ. रतन लाल शर्मा की प्रेरक कहानी, राजस्थान के सूखे वातावरण में जैविक खेती को बहुत मुश्किल माना जाता है। ऐसे शुष्क वातावरण में नींबू की बागवानी भी कोई आसान काम नहीं है। लेकिन अगर इसे सही तरीके से किया जाए तो नींबू की खेती किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। इस लेख में हम आपको नींबू की पैदावार बढ़ाने के कुछ उपयोगी टिप्स बताने जा रहे हैं।

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जालोर जिले के डॉ. रतन लाल शर्मा ने साल 2009 में ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) करके नींबू की खेती करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने 300 नींबू के पौधे लगाए और उनमें किसी भी तरह का रासायनिक खाद नहीं डाला। बल्कि उन्होंने जैविक तरीके से नींबू की खेती की। 5 साल बाद जब नींबू अच्छे से तैयार हो गए तो वे उन्हें बेचने के लिए मंडी गए। लेकिन उनकी फसल को उचित दाम नहीं मिल पाया। इससे निराश होकर किसान ने अपनी फसल को बेचा नहीं।

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जैविक नींबू की खेती और महिला सशक्तिकरण

उस समय नींबू का भाव 250 रुपये प्रति किलो चल रहा था। इस निराशा के बाद डॉ. शर्मा ने बाजार में बेचने के बजाय गांव की महिलाओं को उचित दाम में नींबू बेचने का विचार किया ताकि महिलाओं को रोजगार मिल सके। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घरेलू उद्योग को प्रेरित किया। अब गांव की महिलाएं नींबू से अचार, जैम, शरबत सहित कई चीजें बनाती हैं। गांव के जिन लोगों को नींबू की जरूरत होती है, उन्हें इस्तेमाल के लिए दे दिया जाता है।

जैविक खेती क्या है?

डॉ. रतन लाल शर्मा ने बताया कि जैविक खेती पर्यावरण की शुद्धता बनाए रखने में मदद करती है। जैविक खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इस प्रकार की खेती में प्रकृति में पाए जाने वाले तत्वों का उपयोग खेती में किया जाता है। जैविक खेती में गोबर की खाद, कम्पोस्ट खाद, जीवाणु खाद, फसल अवशेष और प्राकृतिक रूप से उपलब्ध खनिजों जैसे रॉक फॉस्फेट, जिप्सम का उपयोग किया जाता है। फसलों को हानिकारक बैक्टीरिया से बचाने के लिए प्राकृतिक रूप से उपलब्ध बैक्टीरिया, मित्र कीट और जैविक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है।

जैविक खेती के फायदे

डॉ. रतन लाल शर्मा बताते हैं कि जैविक खेती करने से किसानों की जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। सिंचाई भी कम करनी पड़ती है। रासायनिक खादों पर कम निर्भरता के कारण लागत कम हो जाती है। फसलों की उत्पादकता बढ़ती है। बाजार में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों की आमदनी भी बढ़ती है। जैविक खाद के इस्तेमाल से जमीन की गुणवत्ता में सुधार होता है।