Geeta Gyan: भगवद गीता में श्री कृष्ण ने बताया, कैसे मनुष्य पाप में फंसता है, जानिए

By charpesuraj4@gmail.com

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Geeta Gyan: भगवद गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया है कि आखिर मनुष्य पाप के दलदल में क्यों फंस जाता है। कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के विचार से जब अर्जुन विचलित हो उठते हैं, तब भगवान कृष्ण उन्हें गीता का ज्ञान देते हैं। साथ ही ये भी जवाब देते हैं कि आखिर किन कारणों से मनुष्य पाप करने को मजबूर हो जाता है। आइये, जानते हैं इस सवाल का जवाब और पाप से बचने के उपाय।

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आपने अपने आसपास टीवी, अखबार आदि में देखा और सुना होगा कि कहीं चोरी हो गई, कहीं किसी ने किसी की व्यक्तिगत दुश्मनी के चलते हत्या कर दी। कलियुग में हमारे आसपास इतने सारे अपराध हो रहे हैं कि ऐसी भयावह घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। अखबारों में ज्यादातर खबरें किसी न किसी अपराध से जुड़ी हुई होती हैं। धर्म की भाषा में कहें तो धरती पर पाप बढ़ रहे हैं। बहुत से लोग छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करने के लिए बड़े-बड़े अपराध कर लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि ये मानव के पाप सिर्फ कलियुग में ही हो रहे हैं। द्वापर युग में भी जब चारों ओर पाप बढ़ने लगे थे, तब अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा था कि आखिर मनुष्य पाप कब करता है? ऐसा क्या होता है जो उसे पाप करने पर मजबूर कर देता है? तब श्री कृष्ण ने अर्जुन का मार्गदर्शन किया था। आइये जानते हैं श्री कृष्ण ने अर्जुन से तब क्या कहा था।

अत्यधिक स्वार्थ कराता है पाप
मनुष्य पाप क्यों करता है? इस सवाल का जवाब देते हुए श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि धरती पर हर मनुष्य अपने भले के लिए ही कार्य करता है लेकिन जब किसी व्यक्ति का स्वार्थ बढ़ जाता है, तो वो सिवाय अपने बारे में किसी और के बारे में नहीं सोचता। उसे सिर्फ ज्यादा पाने की लालसा होती है। इस चक्कर में मनुष्य ये नहीं सोचता कि उसके स्वार्थ से किसी और का नुकसान तो नहीं होगा या फिर उसे कोई कष्ट तो नहीं सहना पड़ेगा। उसकी भावनाएँ मर जाती हैं और वो दूसरों के दुःख में भी अपना सुख देखने लगता है।

काम और मोह कर देते हैं अंधा
गीता का उपदेश देते हुए श्री कृष्ण कहते हैं कि काम और मोह भी मनुष्य को पाप करने के लिए मजबूर कर देते हैं। काम का मतलब है किसी दूसरे इंसान को किसी वस्तु की तरह भोगने की इच्छा। जिस तरह कोई बच्चा किसी खिलौने के लिए ज़िद करता है और तब तक रोता रहता है जब तक उसे वो खिलौना न मिल जाए और वो शांत न हो जाए, उसी तरह बड़े होने के बाद भी किसी दूसरे इंसान को बिना नैतिकता और संवेदना के भोगने की इच्छा व्यक्ति को पाप करने के लिए मजबूर कर देती है। इंसान किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति मोह में अंधा हो जाता है और उसे पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाता है।

क्रोध बुद्धि का कर देता है नाश
क्रोध कई परिस्थितियों में आता है। कभी-कभी अत्यधिक पीड़ा भी क्रोध का कारण बनती है लेकिन क्रोध के कारण व्यक्ति कुछ भी सही सोचने में असमर्थ हो जाता है। थोड़े समय के लिए ही सही, उसकी बुद्धि काम करना बंद कर देती है और वह सही दिशा में कुछ भी सोच नहीं पाता। जैसे जब बहुत अधिक धुआँ होता है तो कुछ देर के लिए आग ढक जाती है और असलियत का पता नहीं चल पाता, उसी तरह क्रोध भी धुआँ के समान होता है। जब ये ज्यादा हो जाता है तो आसपास मौजूद कुछ भी दिखाई नहीं देता।