धान को बेहद नुक्सान पहुँचाती है ये बीमारी जान ले इस बीमारी से फसल को बचाने के उपाय…

By Alok Gaykwad

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धान को बेहद नुक्सान पहुँचाती है ये बीमारी जान ले इस बीमारी से फसल को बचाने के उपाय, धान की खेती करने वाले हर किसान को कई तरह के जंगली घासों से परेशानी होती है. कुछ खरपतवार इतने जिद्दी होते हैं कि एक बार उखाड़ने के बाद भी फिर से उग आते हैं. ऐसी स्थिति में किसान भाइयों को कृषि वैज्ञानिक की ये सलाह जरूर माननी चाहिए…

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झारखंड के हजारीबाग में ही नहीं, यूपी-बिहार के कई जिलों में भी किसान धान की खेती करते हैं. वे भी मानसून को देखते हुए इसकी तैयारी कर रहे हैं. लेकिन, धान की बुवाई के साथ ही खेतों में एक और समस्या खड़ी हो जाती है, अगर इसका समय पर इलाज ना किया जाए तो उत्पादन में 50 फीसदी तक की कमी आ जाती है.

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इसी बारे में हजारीबाग के गोरिया कर्मा स्थित आईसीसीआर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरके सिंह ने बताया कि धान के किसानों के लिए खरपतवार की समस्या बहुत आम है. ये समस्या हर धान उपजाने वाले किसान को परेशान करती है. इसका समय पर उपचार भी जरूरी है.

उन्होंने आगे कहा कि धान के साथ मुख्य रूप से सवई, मकर, कोदो, बान्हा, सफेद घास, भांगरा, बडी दूधी, जंगली धान, दूब और मोथा आदि घास उग आती हैं, जिन्हें निकालने के लिए किसान निराई करते हैं. लेकिन, इनमें से ज्यादातर घास जिद्दी प्रकृति के होते हैं. एक बार निकालने पर फिर से उग आते हैं.

कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि जहां एक तरफ खरपतवार के कारण किसान को फसल में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, वहीं दूसरी तरफ इन खरपतवारों के कारण फसल की उत्पादन क्षमता भी कम हो जाती है. इससे धान का पौधा कमजोर हो जाता है. खेत में ज्यादा खरपतवार होने से फसल उत्पादन में 50 फीसदी तक की कमी आ सकती है.

उन्होंने आगे कहा कि खरपतवार निकालने के लिए बाजार में भले ही कई तरह की दवाइयां उपलब्ध हैं, लेकिन सेमी गोल्ड, हंटर, ग्रास किलर दवाइयां सबसे ज्यादा कारगर हैं. किसान धान की बुवाई के 72 घंटे बाद इन दवाओं का खेत में इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए प्रति एकड़ में 1 लीटर दवा का इस्तेमाल करना चाहिए. दवा का ज्यादा इस्तेमाल करने से पौधे के मरने का खतरा रहता है.